उत्तर प्रदेश : उत्तर प्रदेश सरकार का बड़ा फैसला,बुढ़ापे में माता-पिता को सताया तो संपत्ति से धोना पड़ेगा हाथ...!
आखिर जिस समाज में मां-बाप अपने ही घर में सुरक्षित क्यों नहीं हैं ?
उत्तर प्रदेश ( लखनऊ ) ओम प्रकाश सिंह । बुजुर्गों के साथ अत्याचार का सबसे बड़ा कारण अक्सर उनका डर होता है। उन्हें घर से निकाल देने, मारपीट करने, संपत्ति छीन लेने या सामाजिक रूप से अलग-थलग कर देने की धमकी दी जाती है। कई मामलों में उन्हें मोबाइल फोन तक इस्तेमाल नहीं करने दिया जाता है। किसी रिश्तेदार से मिलने या पड़ोसी से बात करने पर भी रोक लगाई जाती है। ऐसी स्थिति में केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि पीड़ित स्वयं शिकायत करे।
शिकायत की सुनवाई के लिए 30 दिन की समयसीमा तय की गई है।
बुजुर्गों के लिए टोल-फ्री सुविधा की व्यवस्था की बात भी सामने आई है, ताकि जो बुजुर्ग खुद कार्यालय तक नहीं पहुंच सकते, वे भी अपनी शिकायत दर्ज करा सकें। केंद्र का 2007 का ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम’ पहले से ही मौजूद है। यह अधिनियम वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण, संपत्ति की सुरक्षा और कुछ परिस्थितियों में संपत्ति हस्तांतरण को निरस्त करने जैसे अधिकार देता है। सर्वोच्च न्यायालय भी स्पष्ट कर चुका है कि वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा और भरण-पोषण सुनिश्चित करने के लिए परिस्थितियों के अनुसार ट्रिब्यूनल संतान या रिश्तेदार को संपत्ति से हटाने का आदेश दे सकता है। हालांकि ऐसे मामलों में संबंधित पक्षों के अन्य कानूनी अधिकारों पर भी विचार करना आवश्यक है।
इसलिए उत्तर प्रदेश का कदम केवल संपत्ति से बेदखली का अधिकार नहीं है। यह बुजुर्गों को भयमुक्त जीवन देने की दिशा में प्रशासनिक प्रक्रिया को मजबूत करने वाला कदम है। मेरे संज्ञान में इंदौर जैसे महानगर से जुड़ा एक मामला भी आया है। इस मामले में आरोप है कि एक बेटे ने अपनी मां के मकान और जेवर पर कब्जा कर लिया है। उन्हें दिनभर में केवल दो रोटी दी जाती हैं और किसी से बातचीत तक नहीं करने दी जाती। यदि किसी बुजुर्ग को घर में कैदी की तरह रखा जा रहा हो और इतना भयभीत कर दिया गया हो कि वह मदद मांगने की हिम्मत तक न कर सके, तो यह केवल पारिवारिक विवाद नहीं है। यह मानवीय संवेदना और कानून दोनों के लिए गंभीर चुनौती है। ऐसे मामलों में प्रशासन को शिकायत का इंतजार करने के बजाय उपलब्ध सूचना के आधार पर प्राथमिक जांच करनी चाहिए। बुजुर्ग की सुरक्षा और आवश्यक कानूनी कार्रवाई की व्यवस्था करनी चाहिए।
अन्य राज्यों के लिए सीख और निष्कर्ष
उत्तर प्रदेश के इस फैसले से मध्य प्रदेश सहित अन्य राज्यों को भी सीख लेनी चाहिए। कानून तभी प्रभावी माना जाएगा, जब वह उस बुजुर्ग तक पहुंचे जो डर के कारण दरवाजा खोलकर अपनी पीड़ा भी नहीं बता पा रहा। संपत्ति बच्चों को देने का अर्थ यह नहीं है कि माता-पिता अपने सम्मान का अधिकार भी उन्हें सौंप दें। जिस संतान ने माता-पिता की जिंदगी भर की कमाई और संपत्ति पर अधिकार पाने की कोशिश की है, उसे यह समझना होगा। संपत्ति विरासत हो सकती है, लेकिन माता-पिता पर अत्याचार करने का लाइसेंस नहीं हो सकती है।
अब जरूरत है कि मध्य प्रदेश भी ऐसी स्पष्ट, सरल और बुजुर्ग-मित्र व्यवस्था लागू करे। शिकायत, जांच, सुरक्षा और त्वरित निर्णय, इन चारों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।




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